Sunday, October 18, 2009

गाँधी जीवन दर्शन पर लोक संवाद

गाँधी जीवन दर्शन पर लोक संवाद
गाँधी जीवन दर्शन केवल पढने लिखने के लिए नहीं है , वरन हममें से हर एक के लिए संपूर्ण जीवन को जीने के लिए एक सहज , सुलभ , प्राकृतिक तौर तरीका है| आज की दुनिया का जो स्वरुप उभरा है वह अपनी-अपनी समझ से अपने जीवन काल में आजतक मनुष्यों ने जो प्रयत्न किये, उसका कुल नतीजा आज की हमारी दुनिया है. आज की दुनिया की अच्छाइयों - बुराइयों या सुविधा और समस्याओं का पूरा श्रेय आज तक पैदा हुए  मानव समाज को है. आज के काल में मनुष्यों की संख्या और गतिविधि इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि हममे से हर एक मनुष्य की जीवन शैली या दैनन्दिन जीवन की गतिविधियों से सारी दुनिया के प्राकृतिक जीवन क्रम पर विनाशकारी असर बढ़ता ही जा रहा है. आज की हवा, पानी, जमीन यानी प्रकृति के हर आयाम के सामने एक अलार्म बज रहा है कि जल, जंगल, जमीन का अस्तित्व खतरे में है. दुनिया कि कोई सरकार अकेले या मिलकर दुनिया में धरती के जीवन क्रम के समक्ष खड़े आसन्न संकट से निकलने का समाधानकारी रास्ता नहीं निकाल सकती. जल, जंगल, व जमीन को बचाने का रास्ता हम सब को मालूम है, पर हम अपनी आज की बनी बनाई या आरामग्रस्त जीवनशैली के लोभ-लालचवश, प्रकृति के जीवन क्रम को ही समाप्त करने की  दिशा में जानते समझते बूझते हुए भी व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र या दुनिया के स्तर पर अंततः विनाशकारी सिद्ध होने वाली जीवन शैली को छोड़ने की दिशा में बढ़ नहीं पा रहे है. गांधीजी जैसा मानते थे वैसा जीवन में करते भी थे. उनका जीवन क्रम ही हम सबके लिए सबसे बड़ा सन्देश है.

इसी भूमिका के साथ अक्टूबर २००८ में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के एजुकेशनल मल्टीमीडिया रिसर्च सेण्टर के माध्यम से देशभर के विश्वविद्यालयीन छात्रों के लिए यू.जी.सी. के कार्यक्रम के तहत गाँधी दर्शन को समझने की दृष्टी से "गाँधी कल आज और कल" तथा "वर्तमान की चुनौतियां और गाँधी दर्शन" शीर्षक से दिए गए व्याख्यान आज की दुनिया के समक्ष खड़ी समस्यायों के व्यक्तिगत एवं सामाजिक समाधानों  की सामूहिक दृष्टी विकसित करने की पहल एवं लोकसंवाद की दृष्टी से प्रस्तुत हैं.